अंगकोरवाट | अंकोरवाट (Angkor Wat)

भूमिका

अंगकोरवाट (Angkor Wat) कंबोडिया के सिएम रीप (Siem reap) के पास अंगकोर क्षेत्र में स्थित एक विशाल मंदिर परिसर (temple complex) है। यह विशाल मंदिर भगवान विष्णु को समर्पित है। कम्बोडिया का प्राचीन नाम कम्बुज (कंबुज) मिलता है। जिसका निर्माण ख्मेर साम्राज्य के राजा सूर्यवर्मन् द्वितीय ने १२वीं शताब्दी के प्रथम चरण में करवाया था। सूर्यवर्मन् द्वितीय का शासनकाल १११३ ई॰ से लगभग ११५० ई॰ तक रहा। सूर्यवर्मन् वैष्णव थे। उन्होंने अपने गुरु दिवाकर पण्डित की प्रेरणा से अनेक यज्ञों का अनुष्ठान किया था।

अंगकोर शहर वह राजनीतिक सत्ता का केंद्र था, जहाँ से ख्मेर राजाओं के एक वंश ने दक्षिण-पूर्व एशिया के इतिहास के सबसे बड़े, समृद्ध और अत्यंत विकसित साम्राज्यों में से एक पर शासन किया। ९वीं शताब्दी के अंत से लेकर १३वीं शताब्दी के प्रारम्भ तक यहाँ अनेक निर्माण कार्य किये गये। इन्हीं में से एक और सर्वप्रमुख है— अंगकोर वाट।

माना जाता है कि अंगकोर वाट के निर्माण में लगभग तीन दशक लगे।

संक्षिप्त परिचय

नामअंगकोरवाट (Angkor Wat)
लिप्यंतरणअंगकोर वाट, अंकोरवाट
निर्मातासूर्यवर्मन् द्वितीय (१११३-११५० ई॰)
देशकंबोडिया
स्थितिसिएम रीप नदी (Siem reap River) के तट पर
महत्त्वविश्व धरोहर स्थल, १९९२ (युनेस्को)
अंगकोरवाट

व्युत्पत्ति (Etymology)

अंगकोरवाट या अंकोरवाट को रोमन लिपि में इसे “Angkor Wat” लिखा जाता है। अंगकोरथोम का अर्थ है— “मंदिर नगर” या “मंदिरों का नगर” (Temple City or City of Temple)।

अंगकोरवाट (Angkor Wat) में नोकोर / Nokor (खमेर : नोको) शब्द संस्कृत के शब्द नगर से निकला है; जिसका अर्थ है— शहर, नगर या पुर (City)। इसमें वाट का अर्थ है— मंदिर परिसर (Temple Grounds)। वाट शब्द संस्कृत शब्द वाट से लिया गया है जिसका अर्थ है— अहाता या घेरा (Enclosure)।

निर्माण का विवरण

अंगकोर वाट का विशाल धार्मिक परिसर हजार से अधिक इमारतों से मिलकर बना है और विश्व के महान सांस्कृतिक आश्चर्यों में से एक माना जाता है। लगभग ४०० एकड़ (१६० हेक्टेयर) में फैला अंगकोर वाट विश्व की सबसे बड़ा धार्मिक संरचना है। यह ख्मेर वास्तुकला (Khmer architecture) की उत्कृष्टता का सर्वोच्च उदाहरण प्रस्तुत करता है।

६१७ फुट (१८८ मीटर) लंबा पुल इस स्थल तक पहुँच प्रदान करता है। मंदिर तक पहुँचने के लिए तीन दीर्घाओं (galleries) से होकर गुजरना पड़ता है, जिनके बीच पक्की पगडंडियाँ बनी हैं। मंदिर की दीवारें अत्यंत उच्च गुणवत्ता वाली उत्कीर्ण भित्तिचित्र या उभरी हुई नक्काशी (bas-relief sculptures) से ढकी हुई हैं, जिनमें हिंदू देवताओं, प्राचीन ख्मेर जीवन-दृश्य, तथा महाभारत और रामायण की कथाएँ दर्शायी गयी हैं।

अंगकोरवाट को वास्तुकला का आश्चर्य माना जाता है। इस देवालय के चारो ओर एक गहरी खाई है। इस खाई की लम्बाई लगभग २.५ मील (४ किमी॰) और चौड़ाई ६५० फुट है। खाई पर पश्चिम की ओर पत्थर का एक पुल है। मंदिर के पश्चिमी द्वार के निकट से प्रारम्भ से होकर प्रथम वीथि तक एक मार्ग है जिसकी लम्बाई लगभग १५६० फुट है और भूतल से ऊँचाई ७ फुट है। पहली वीथि पूर्व से पश्चिम ८०० फुट और उत्तर से दक्षिण ६७५ फुट लम्बी है। मंदिर के मध्यवर्ती शिखर की ऊँचाई भूमितल से २१० फुट से भी अधिक है।

मंदिर की भव्यता के साथ-साथ इसके शिल्प की सूक्ष्म-विदग्धता, नक्शे की सममिति, यथार्थ अनुपात, सुंदर अलंकृत मूर्तिकारी इत्यादि भी उत्कृष्ट कला की दृष्टि से श्लाघनीय हैं।

प्रतीकात्मकता

अंगकोर वाट के सभी मूल धार्मिक रूपांकन (religious motifs) हिंदू धर्म से लिए गये थे। यह मंदिर भगवान विष्णु को समर्पित था। इसके पाँच केंद्रीय शिखर “मेरु पर्वत” की चोटियों का प्रतीक हैं, जिसे हिंदू पौराणिक कथाओं में देवताओं का निवास स्थान माना जाता है। यह पर्वत एक महासागर से घिरा हुआ है और मंदिर परिसर की विशाल खाई (moat) संसार के किनारे स्थित उस “ब्रह्मांडीय महासागर” (cosmic ocean) का प्रतीक है।

उद्देश्य

विद्वानों ने अंगकोर वाट के निर्माण के अधोलिखित उद्देश्य बताये हैं—

  • अंत्येष्टि मंदिर (funerary temple)— अंगकोर वाट को सूर्यवर्मन् द्वितीय के अंतिम संस्कार स्थल के रूप में बनाया गया था जहाँ उनके अवशेष रखे जाने थे। इसका पश्चिम-मुखी होना ख्मेर मंदिरों में असामान्य और यह तथ्य इस उद्देश्य का समर्थन करता है।
  • खमेर साम्राज्य का राज्य मंदिर— राजा सूर्यवर्मन् द्वितीय द्वारा निर्मित यह मंदिर उनके शासनकाल का केंद्रीय राज्य मंदिर था, जो राजनीतिक शक्ति और दिव्य राजत्व का प्रतीक माना जाता था।
  • मेरु पर्वत का प्रतीकात्मक रूप— मंदिर के पाँच शिखर मेरु पर्वत का प्रतिनिधित्व करते हैं, जो हिंदू ब्रह्मांड विज्ञान में देवताओं का निवास स्थान माना जाता है। साथ ही चारों ओर की खाई ब्रह्माण्डीय महासागर (Cosmic Ocean) का प्रतीक है।
  • धार्मिक उपासना (हिंदू → बौद्ध)— मूल रूप से यह मंदिर भगवान विष्णु को समर्पित था। लेकिन बाद में यह एक प्रमुख बौद्ध धर्म का केंद्र बन गया और आज भी सक्रिय उपासना स्थल है।

हिन्दू से बौद्ध मंदिर में परिवर्तन

११७७ ई॰ में जब आधुनिक वियतनाम के चाम (Cham) लोगों ने अंगकोर पर आक्रमण कर उसे लूट लिया तो राजा जयवर्मन् सप्तम (शासनकाल ११८१ से लगभग ११२० ई॰) ने यह मान लिया कि हिंदू देवताओं ने उनकी रक्षा नहीं की। इसके बाद जब उन्होंने पास में एक नई राजधानी अंगकोर थोम बसायी और उसे बौद्ध धर्म को समर्पित किया।

इसके परिणामस्वरूप अंगकोर वाट एक बौद्ध तीर्थस्थल बन गया और इसकी कई हिंदू देवताओं की मूर्तियों व नक्काशियों को बौद्ध कला से बदल दिया गया।

पुनः खोज का दावा?

१५वीं शताब्दी के प्रारम्भ में अंगकोर को परित्यक्त कर दिया गया। इसके बावजूद थेरवाद बौद्ध भिक्षुओं (Theravada Buddhist monks) अंगकोर वाट का संरक्षण करते रहे। जिससे बौद्ध भिक्षुओं के कारण यह एक महत्त्वपूर्ण तीर्थस्थल बना रहा और यूरोपीय यात्रियों को भी आकर्षित करता रहा। १८६३ ई॰ में फ्रांसीसी औपनिवेशिक शासन स्थापित होने के बाद अन्वेषक हेनरी मोहोट (Henri Mouhot) ने अंगकोर वाट को “पुनः खोजने” का दावा किया।

पुनर्स्थापन और संरक्षण

२०वीं शताब्दी में अंगकोर में कई पुनर्स्थापन (restoration) कार्यक्रम शुरू किये गये लेकिन १९७० के दशक में कंबोडिया में फैली राजनीतिक अशांति के कारण उन्हें रोकना पड़ा। १९८० के दशक के मध्य में जब कार्य पुनः प्रारम्भ हुआ तो आवश्यक जीर्णोद्धार बहुत व्यापक स्तर पर किया गया। विशेष रूप से कई हिस्सों को तोड़कर फिर से बनाया गया।

१९९२ ई॰ में युनेस्को ने अंगकोर परिसर (Angkor complex) को विश्व धरोहर स्थल (World Heritage site) घोषित किया। अंगकोर परिसर में अंगकोर वाट भी शामिल है। इसे तुरंत ही “खतरे में पड़ी विश्व धरोहर” की सूची में डाल दिया। आने वाले वर्षों में पुनर्स्थापन कार्यों में तेजी आयी और २००४ में अंगकोर को खतरे की सूची (danger list) से हटा दिया गया।

आज अंगकोर वाट दक्षिण-पूर्व एशिया के सबसे महत्त्वपूर्ण तीर्थस्थलों में से एक है और एक अत्यंत लोकप्रिय पर्यटन का आकर्षण केन्द्र भी है। यह मंदिर परिसर कंबोडिया के राष्ट्रीय ध्वज पर भी दर्शाया गया है।

अंगकोरथोम और अंकोरवाट

अंगकोरथोम और अंकोरवाट में अक्सर भ्रम हो जाता है। परन्तु ये दोनों भिन्न हैं।

कंबोडिया का अंगकोर क्षेत्र ९वीं-१२वीं शताब्दी के खमेर साम्राज्य का केन्द्र था। इसी क्षेत्र में दो प्रमुख स्थल हैं—

  • अंगकोरथोम— एक किलेबंद राजधानी नगर
  • अंकोरवाट— एक विशाल मंदिर-समूह

ये दोनों समान अंगकोर पुरातात्त्विक पार्क (Angkor Archaeological Park) में स्थित सिएम रीप (Siem Reap) के पास स्थित है। अंकोरवाट दक्षिण में और अंगकोरथोम उत्तर में है, इनके मध्य लगभग १.७ किमी॰ की दूरी है।

अंकोरवाट और अंगकोरथोम को एक ही वर्ष (१९९२) में यूनेस्को विश्व धरोहर स्थल घोषित किया गया था, क्योंकि यूनेस्को ने इन्हें “अंगकोर” नामक एक ही स्थल के रूप में सूचीबद्ध किया है।

यूनेस्को ने अंकोरवाट और अंगकोरथोम को अलग‑अलग सूचीबद्ध नहीं किया है। इसके बजाय, पूरा अंगकोर पुरातात्त्विक उद्यान — जिसमें अंकोरवाट, अंगकोरथोम, बायोन, ता प्रोम और कई अन्य मंदिर शामिल हैं। इनको १९९२ में एक ही विश्व धरोहर स्थल के रूप में दर्ज किया गया। संक्षेप में—

  • दोनों को एक ही वर्ष १९९२ में विश्व धरोहर स्थल किया गया।
  • ये दोनों एक ही यूनेस्को स्थल “अंगकोर” का हिस्सा हैं।

संक्षिप्त रूप से इसे इस प्रकार से देख सकते हैं—

आधारअंगकोरथोमअंकोरवाट
नामअंगकोरथोम / अंकोरथोम (Ankor Thom)अंकोरवाट (Ankor Wat)
प्रकारप्राचीन राजधानी / दुर्ग नगरीमंदिर समूह
निर्माता जयवर्मन् सप्तम्सूर्यवर्मन् द्वितीय
पहचान बायोन मंदिर, विशाल द्वार, दुर्गीकरणपंच-शिखर, विष्णु मंदिर
महत्त्वविश्व धरोहर स्थल, १९९२विश्व धरोहर स्थल, १९९२

निष्कर्ष

अंगकोर वाट मूल रूप से हिंदू देवता भगवान विष्णु को समर्पित एक मंदिर था। भगवान विष्णु को समर्पित इस मंदिर की संरचना हिंदू ब्रह्मांड विज्ञान को दर्शाती है। इसके पाँच शिखर देवताओं के निवास स्थान मेरु पर्वत का प्रतीक हैं, जबकि विशाल खाई (moat) ब्रह्मांडीय महासागर का प्रतिनिधित्व करती है।

११७७ ई॰ में चाम लोगों द्वारा अंगकोर पर आक्रमण के बाद सूर्यवर्मन् द्वितीय के पुत्र राजा जयवर्मन् सप्तम ने मंदिर की आस्था को बौद्ध धर्म की ओर मोड़ दिया। १५वीं शताब्दी की शुरुआत में अंगकोर के परित्यक्त हो जाने के बावजूद थेरवाद बौद्ध भिक्षुओं ने अंगकोर वाट की देखभाल जारी रखी, जिससे यह एक प्रमुख तीर्थस्थल के रूप में सुरक्षित बना रहा। आज अंगकोर वाट यूनेस्को विश्व धरोहर स्थल है और दक्षिण-पूर्व एशिया का एक प्रमुख तीर्थ और पर्यटन केंद्र है।

FAQ

अंगकोर वाट क्या है?

अंगकोर वाट (Angkor Wat) कंबोडिया के सिएम रीप (Siem Reap) के पास स्थित है। १२वीं शताब्दी में ख्मेर राजा सूर्यवर्मन् द्वितीय द्वारा निर्मित यह एक विशाल मंदिर परिसर है। यह विश्व का सबसे बड़ा धार्मिक संरचना है, जो लगभग ४०० एकड़ (१.६ वर्ग किमी॰) में फैला हुआ है। इसे ख्मेर वास्तुकला (Khmer architecture) की उत्कृष्टता का प्रतीक माना जाता है।

अंगकोर वाट मूल रूप से भगवान विष्णु को समर्पित एक हिंदू मंदिर था। लेकिन राजा जयवर्मन् सप्तम के शासनकाल में यह एक बौद्ध मंदिर में परिवर्तित कर दिया गया। इस परिवर्तन के दौरान कई हिंदू मूर्तियों को बौद्ध कला से बदल दिया गया।

अंगकोर वाट के पाँच मुख्य शिखर हिंदू पौराणिक कथाओं में देवताओं के निवास स्थान मेरु पर्वत का प्रतीक हैं।

मंदिर की दीवारों पर बारीक नक्काशीदार भित्तिचित्र (bas-relief sculptures) बने हैं, जिनमें हिंदू देवताओं, ख्मेर जीवन के दृश्य के साथ-साथ महाभारत और रामायण की कथाओं का भी अंकन मिलता है। वर्तमान में अंगकोर वाट एक प्रमुख तीर्थस्थल और विश्व-प्रसिद्ध पर्यटन का आकर्षण केंद्र है।

अंगकोर वाट कहाँ है?

अंगकोर वाट (Angkor Wat) का विशाल मंदिर परिसर कंबोडिया के उत्तर-पश्चिमी क्षेत्र में सिएम रीप के पास स्थित है। ख्मेर साम्राज्य के राजा सूर्यवर्मन् द्वितीय ने इसे १२वीं शताब्दी में बनवाया था। अंगकोर वाट विश्व का सबसे बड़ा धार्मिक ढाँचा है, जिसमें ४०० एकड़ (१.६ वर्ग किमी॰) में फैली हजार से अधिक इमारतें शामिल हैं। यह यूनेस्को विश्व धरोहर स्थल (१९९२ ई॰) भी है।
यह ख्मेर वास्तुकला का एक अद्भुत उदाहरण है और दक्षिण-पूर्व एशिया का एक प्रमुख तीर्थस्थल है। जहाँ बड़ी संख्या में पर्यटक आते हैं। यह मंदिर परिसर कंबोडिया के राष्ट्रीय ध्वज पर भी दर्शाया गया है।

अंगकोर वाट के निर्माता और निर्माणकाल क्या है?

कंबोडिया के सिएम रीप के पास स्थित अंगकोर वाट को ख्मेर साम्राज्य के राजा सूर्यवर्मन् द्वितीय द्वारा १२वीं शताब्दी के प्रथमार्ध में निर्मित करवाया गया था। सूर्यवर्मन् द्वितीय का शासनकाल १११३ से लगभग ११५० ई॰ तक रहा। विश्व के महान सांस्कृतिक आश्चर्यों में से एक यह विशाल मंदिर परिसर को सूर्यवर्मन् के अंतिम संस्कार मंदिर के रूप में बनाया गया था, जहाँ उनके अवशेषों को रखा जाना था। इसके निर्माण में लगभग तीन दशक लगे।

अंगकोर वाट के निर्माण का मुख्य उद्देश्य क्या था?

अंगकोर वाट का मुख्य उद्देश्य ख्मेर राजवंश का “राज्य मंदिर” और  सूर्यवर्मन् द्वितीय अंत्येष्टि मंदिर (funerary temple)  होना था। यह मेरु पर्वत का प्रतीक है और मूल रूप से हिंदू देवता विष्णु को समर्पित था।

अंगकोर वाट का मुख्य उद्देश्य—

  • धार्मिक उपासना (हिंदू → बौद्ध)— मूल रूप से यह मंदिर भगवान विष्णु को समर्पित था। लेकिन बाद में यह एक प्रमुख बौद्ध धर्म का केंद्र बन गया और आज भी सक्रिय उपासना स्थल है।
  • खमेर साम्राज्य का राज्य मंदिर— राजा सूर्यवर्मन् द्वितीय द्वारा निर्मित यह मंदिर उनके शासनकाल का केंद्रीय राज्य मंदिर था, जो राजनीतिक शक्ति और दिव्य राजत्व का प्रतीक माना जाता था।
  • अंत्येष्टि मंदिर— विद्वानों का मानना है कि यह मंदिर सूर्यवर्मन् द्वितीय के अंतिम संस्कार स्थल के रूप में बनाया गया था जहाँ उनके अवशेष रखे जाने थे। इसका पश्चिम-मुखी होना ख्मेर मंदिरों में असामान्य और यह तथ्य इस उद्देश्य का समर्थन करता है।
  • मेरु पर्वत का प्रतीकात्मक रूप— मंदिर के पाँच शिखर मेरु पर्वत का प्रतिनिधित्व करते हैं, जो हिंदू ब्रह्मांड विज्ञान में देवताओं का निवास स्थान माना जाता है।

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