संक्षिप्त परिचय
| नाम | अंग (अङ्ग) |
| राजधानी | चंपा (चम्पा) |
| विस्तार | मुंगेर, भागलपुर जनपद |
| राज्य | बिहार |
| स्थिति | गंगा नदी के तट पर |
| प्रथम उल्लेख | अथर्ववेद |
| महाजनपदकाल | १६ महाजनपदों में एक |

अंग का इतिहास
अंग का विवरण वैदिक साहित्य, महाभारत, बौद्ध, जैन व अन्य संस्कृति ग्रन्थों में मिलता है—
उत्तर-वैदिक काल
अंग देश का सर्वप्रथम उल्लेख अथर्ववेद ५/२२/१४ में प्राप्त होता है—
”गन्धारिभ्यो मूजवद्भोऽङ्गेभ्योय मगधेभ्यः।
प्रैष्यन् जनमिव शेवधिं तक्मानं दद्मसि॥”
इस अप्रशंसात्मक कथन से सूचित होता है कि अथर्ववेद के रचनाकाल अर्थात् उत्तर-वैदिक काल तक अंग, मगध की भाँति ही आर्य सभ्यता के प्रभाव से बाहर था। आर्य सभ्यता के विस्तार की सीमा पंजाब से लेकर उत्तर प्रदेश तक ही थी।
महाभारत काल
महाभारतकाल में अंग और मगध एक ही राज्य के दो भाग थे। इसमें मगधराज जरासंध के पिता बृहद्रथ को अंग का शासक बताया गया है।
“अंग बृहद्रथं चैव मृतं सृंजय शुश्रुम”— शांतिपर्व (२९/३१)
महाभारत के शांतिपर्व (५/६-७) में उल्लेख मिलता है—
“प्रीत्या ददौ स कर्णाय मालिनीं नगरमथ।
अङ्गेषु नरशार्दूल स राजाऽसीत् सपत्नजित्॥
पालयामास चम्पा च कर्णः परबलार्दनः।
दुर्योधनस्यानुमते तवापि विदित तथा॥”
इससे स्पष्ट है कि जरासंध ने कर्ण को अंग-स्थित मालिनी या चंपापुरी देकर वहाँ का राजा मान लिया था। दुर्योधन ने भी कर्ण को अंगराज घोषित किया था।
वैदिक काल की स्थिति के प्रतिकूल महाभारतकाल में अंग आर्य सभ्यता के प्रभाव में पूर्णरूप से आ गया था जबकि पंजाब का ही एक भाग ‘मद्र’ इस समय आर्य संस्कृति से बहिष्कृत समझा जाता था (महाभारत में कर्ण-शल्य संवाद, कर्ण पर्व)।
महाभारत के अनुसार अंग देश की नींव राजा अंग ने डाली थी। सम्भवतः ऐतरेय ब्राह्मण ८/२२ में उल्लिखित अंग-वैरोचन ही अंग-राज्य का संस्थापक था।
महाजनपदकाल
जातक-कथाओं तथा बौद्ध-साहित्य के अन्य ग्रंथों से ज्ञात होता है कि गौतम बुद्ध से पूर्व, अंग की गणना भारतवर्ष के षोडश महाजनपदों में थी। इस काल में अंग की राजधानी चंपा नगरी थी। अंग नगर या चंपा का उल्लेख ‘बुद्ध चरित’ २७/११ में भी मिलता है। पूर्व-बुद्ध-काल में अंग तथा मगध में राजसत्ता के लिए सदा शत्रुता रही।
जैनसूत्र-उपासकदशा में अंग तथा उसके पड़ोसी देशों की मगध के साथ होने वाली शत्रुता का आभास मिलता है। प्रज्ञापणा सूत्र में आर्य जनपदों के साथ अंग का भी उल्लेख है तथा अंग और बंग को आर्यजनों का महत्त्वपूर्ण स्थान बताया गया है।
अपने ऐश्वर्यकाल में अंग के राजाओं का मगध पर भी अधिकार था जैसा कि विदुरपंडित जातक (कॉवेल ६/१३३) के उस उल्लेख से प्रकट होता है जिसमें मगध की राजधानी राजगृह को अंग देश का ही एक नगर बताया गया है। किंतु इस स्थिति का परिवर्तन होने में अधिक समय न लगा।
मगध साम्राज्य का भाग
मगध के राजकुमार बिम्बिसार ने अंगराज ब्रह्मदत्त को मारकर उसका राज्य मगध में मिला लिया। बिंबिसार अपने पिता की मृत्यु तक अंग का शासक (उपराजा) भी रहा था। जैन ग्रंथों में बिम्बिसार के पुत्र कुणिक अजातशत्रु को अंग और चंपा का राजा बताया गया है। इसके साथ ही अंग मगध साम्राज्य का अंग बन गया।
मौर्यकाल में अंग अवश्य ही मगध के महान साम्राज्य के अंतर्गत था।
कालिदास ने रघुवंश ६/२७ में अंगराज का उल्लेख इंदुमती के स्वयंवर के प्रसंग में मगध-नरेश के ठीक पश्चात् किया है जिससे प्रतीत होता है कि अंग की प्रतिष्ठा पूर्व-गुप्तकाल में मगध से कुछ ही कम रही होगी। रघुवंश ६/२७ में ही अंग-राज्य के प्रशिक्षित हाथियों का मनोहर वर्णन है—
“जगाद चैनामयमगनाथ सुरागनाप्राथित यौवनश्री विनीतनाग विलसूत्रकारैरेन्द्र पद भूमिगतोऽपि भुक्त।”
विष्णु पुराण, अंग ४, अध्याय १८ में अंगवशीय राजाओं का उल्लेख है।
कथासरित्सागर ४४/९ से सूचित होता है कि ग्यारहवीं शती ई० में अंग देश या विस्तार समुद्रतट (बंगाल की खाड़ी) तक था क्योंकि अंग एक नगर विटकपुर समुद्र के किनारे ही स्थित था।
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