संक्षिप्त परिचय
| नाम | अंतर्वेदी |
| लिप्यंतरण | अन्तर्वेदी, अंतर्वेद |
| स्थिति | गंगा और यमुना के मध्य का भू-भाग, उत्तर प्रदेश |
| उल्लेख | प्राचीन अभिलेखों में; जैसे— स्कंदगुप्त का इंदौर ताम्रलेख |

विवरण
अंतर्वेदी को अंतर्वेद भी कहा गया है। गंगा और यमुना के मध्य का भू-भाग या दोआब अंतर्वेदी कहलाता था। इस तरह अंतर्वेदी का विशाल भू-भाग हरिद्वार से प्रयाग तक गंगा और यमुना के मध्य विस्तृत है।
अंतर्वेदी नाम प्राचीन अभिलेखों में प्राप्त होता है। स्कन्दगुप्त के इन्दौर अभिलेख में अंतर्वेदी विषय के शासक (विषयपति) सर्वनाग का विवरण सुरक्षित है।
“परमभट्टारक-महाराजाधिराज-श्रीस्कन्दगुप्तस्याभिवर्द्धमान-विजय-राज्य-संव्वत्सरं शते षच्चत्वा-[रि]ङ् शदुत्तरतमे फाल्गुन-मासे तत्पाद-परिगृहीतस्य विषयपति शर्व्वेनागस्यान्तर्व्वद्यां भोगाभिवृद्धये वर्त्त-माने”
— स्कंदगुप्त का इंदौर ताम्रलेख
उत्तर-वैदिक काल में अंतर्वेदी के क्षेत्र का महत्त्व बढ़ता गया। महाभारतकाल में कुरुओं की राजधानी हस्तिनापुर (गंगा नदी के तट पर, मेरठ) अंतर्वेदी में स्थिति थी। साथ ही पांचाल, शूरसेन, वत्स जैसे राज्यों के कुछ भाग या राजधानी इसी के आसपास स्थिति थे; जैसे— मथुरा यमुना के किनारे, कौशांबी यमुना के किनारे।
महाजनपदकाल में गंगा नदी के पूर्व के भू-भाग का राजनीतिक-सांस्कृतिक महत्त्व बढ़ता गया, जिसमें कोसल और काशी प्रमुख थे।
गुप्तकाल में हम इसे गुप्त साम्राज्य के अंग के रूप में पाते हैं। स्कंदगुप्त के समय अंतर्वेदी गुप्त साम्राज्य के विषय (जनपद/जिला) के एक प्रशासनिक इकाई था, जिसका विषयपति शर्वनाग था।
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