भानुगुप्त (५१० ई०)

भूमिका ५१० ई० में हम मालवा पर भानुगुप्त को शासन करता हुआ पाते हैं। गुप्त राजवंश से इसका सम्बन्ध अस्पष्ट है। इसका जानकारी का स्रोत इसी का एरण स्तम्भ-लेख और बौद्ध ग्रन्थ आर्यश्रीमूलकल्प है। संक्षिप्त परिचय नाम भानुगुप्त पिता — माता — पत्नी — पुत्र — पूर्ववर्ती शासक — उत्तराधिकारी — शासनकाल ५१० ई० से […]

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नरसिंहगुप्त ‘बालादित्य’ (४९५ ई० से लगभग ५३० ई०)

नरसिंहगुप्त () बुधगुप्त की मृत्यु के बाद शासक बना। यह पुरुगुप्त का पुत्र और बुधगुप्त का छोटा भाई था। इसकी उपाधि बालादित्य () मिलती है। संक्षिप्त परिचय नाम नरसिंहगुप्त पिता पुरुगुप्त माता चन्द्रदेवी पत्नी मित्रदेवी पुत्र कुमारगुप्त तृतीय पूर्ववर्ती शासक बुधगुप्त उत्तराधिकारी कुमारगुप्त तृतीय शासनकाल ४९५ ई० से ५३० ई० (?) उपाधि महाराजाधिराज, परमभागवत, बालादित्य

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बुधगुप्त (४७६-४९५ ई०)

कुमारगुप्त द्वितीय के अनन्तर बुधगुप्त () शासक हुआ। परवर्ती गुप्त शासकों में बुधगुप्त सर्वाधिक शक्तिशाली शासक था। संक्षिप्त परिचय नाम बुधगुप्त पिता पुरुगुप्त माता — पत्नी — पुत्र — पूर्ववर्ती शासक कुमारगुप्त द्वितीय उत्तराधिकारी नरसिंहगुप्त शासनकाल ४७६ से ४९५ ई० उपाधि परमभट्टारक, महाराजाधिराज, परमदैवत, परमभागवत, श्रीविक्रम अभिलेख सारनाथ बुद्ध-मूर्ति-लेख; गुप्त सम्वत् १५७ (४७६ ई०) पहाड़पुर

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कुमारगुप्त द्वितीय (४७३ ई०)

भूमिका पुरुगुप्त के बाद सम्भवतया कुमारगुप्त द्वितीय कुछ समय के लिए स्वतंत्र शासक बना था। उसका इतिहास बहुत ही उलझा हुआ है। गुप्त लिपि में कुमारगुप्त () इस तरह अंकित है। संक्षिप्त परिचय नाम कुमारगुप्त (द्वितीय) पिता — माता — पत्नी — पुत्र — पूर्ववर्ती शासक पुरुगुप्त उत्तराधिकारी बुधगुप्त शासनकाल ४७३ से ४७६ ई० उपाधि

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पुरुगुप्त (४६७-४७६ ईस्वी)

भूमिका स्कन्दगुप्त की मृत्यु के पश्चात् गुप्त साम्राज्य का पतन प्रारम्भ हो गया। उपलब्ध प्रमाणों के आधार पर स्कन्दगुप्त के उत्तराधिकारियों का क्रम निर्धारित करना एक कठिन समस्या है। स्कन्दगुप्त के बाद उसका सौतेला भाई पुरुगुप्त गुप्त सम्राट बना। संक्षिप्त परिचय नाम पुरुगुप्त या पूरुगुप्त पिता कुमारगुप्त प्रथम माता अनन्तदेवी पत्नी चन्द्र देवी पुत्र बुधगुप्त

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स्कन्दगुप्त ‘क्रमादित्य’ (≈ ४५५-४६७ ईस्वी)

भूमिका कुमारगुप्त प्रथम की मृत्यु के पश्चात् गुप्त साम्राज्य की बागडोर उसके सुयोग्य पुत्र स्कन्दगुप्त () के हाथों में आयी। जूनागढ़ अभिलेख में उसके शासन की प्रथम तिथि गुप्त सम्वत् १३६ (= ४५५ ईस्वी) उत्कीर्ण मिलती है। गढ़वा अभिलेख तथा चाँदी के सिक्कों में उसकी अन्तिम तिथि गुप्त संवत् १४८ (= ४६७ ईस्वी) अंकित है।

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कुमारगुप्त प्रथम ‘महेन्द्रादित्य’ (≈ ४१५-४५५ ईस्वी)

भूमिका  चन्द्रगुप्त द्वितीय ‘विक्रमादित्य’ के बाद कुमारगुप्त प्रथम ‘महेन्द्रादित्य’ गुप्त-साम्राज्य की गद्दी पर बैठा। वह चन्द्रगुप्त की पत्नी ध्रुवदेवी से उत्पन्न उसका सबसे बड़ा पुत्र था।१ उसका गोविन्दगुप्त नामक एक छोटा भाई भी था जो कुमारगुप्त के समय में बसाढ़ (वैशाली) का राज्यपाल था। कुछ विद्वानों का विचार है कि गोविन्दगुप्त तथा कुमारगुप्त प्रथम के

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चन्द्रगुप्त द्वितीय ‘विक्रमादित्य’ (३७५ ई० – ४१५ ई०)

भूमिका समुद्रगुप्त के पश्चात् चन्द्रगुप्त द्वितीय शासक बने। चन्द्रगुप्त द्वितीय की माता का नाम दत्तदेवी था और वे समुद्रगुप्त की प्रधान महिषी थीं। चन्द्रगुप्त द्वितीय गुप्त राजवंश का सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण एवं शक्तिशाली शासक सिद्ध हुए। उसके शासनकाल में गुप्त-साम्राज्य अपनी पराकाष्ठा पर जा पहुँचा। सामान्य परिचय नाम चन्द्रगुप्त द्वितीय उपाधि अप्रतिरथ, चक्रविक्रम, देवगुप्त, देवराज, देवश्री,

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अंकाई-तंकाई (Ankai-Tankai) | अणकिटणकी

भूमिका अंकाई-तंकाई या अंकाई-टंकाई (Ankai-Tankai) का एक अन्य नाम अणकिटणकी है। यह स्थल जैन धर्म से सम्बन्धित है। यहाँ पर ७ गुफाएँ एक पहाड़ी में काटकर बनायी गयी। यहाँ पर आमने-सामने युगल गिरि-दुर्ग स्थिति है, जिनके नाम अंकाई दुर्ग और तंकाई दुर्ग है। सामान्य परिचय प्राचीन नाम अणकिटणकी वर्तमान नाम अंकाई-तंकाई (अंकाई-टंकाई) तालुका येओला (Yeola)

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अंकलेश्वर (Ankleshwar)

सामान्य परिचय देश भारत राज्य गुजरात जनपद भरूच उल्लेख महाभारत में भौगोलिक स्थिति अंकलेश्वर भरूच से लगभग ८ किलोमीटर दक्षिण में स्थित है। प्राचीन समय में नर्मदा के तट पर यह स्थित था परन्तु वर्तमान में यह नदी लगभग ५ किलोमीटर उत्तर में प्रवाहित हो रही है। प्राचीन उल्लेख यह कथा हमें महाभारत के आदि

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