सांस्कृतिक और ऐतिहासिक स्थल — ४

सांस्कृतिक और ऐतिहासिक स्थल — ४   अजमेर ( अजयमेरु ) वर्तमान में अजमेर राजस्थान में स्थित एक सांस्कृतिक और प्रशासनिक स्थल है। इसकी स्थापना चाह्मान वंशी शासक ‘अजयराज’ ने की थी। इन्हीं के नाम पर इसका नाम अजयमेरु या अजमेर पड़ा है। यह सूफी संत ख्वाजा मुईनुद्दीन चिश्ती के दरगाह के लिए भी प्रसिद्ध […]

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सांस्कृतिक और ऐतिहासिक स्थल — ३

सांस्कृतिक और ऐतिहासिक स्थल — ३   अखनूर अखनूर वर्तमान केन्द्र शासित प्रांत जम्मू और कश्मीर में स्थित एक जनपद है। सैंधव युगीन माण्डा नामक स्थान यहीं पर स्थित था। माण्डा सैंधव सभ्यता का सबसे उत्तरी स्थल है। यहाँ से प्राक्, विकसित और उत्तरकालीन हड़प्पा अवशेष मिले हैं। उदयगिरि-खण्डगिरि ओडिशा के खोर्धा जनपद में भुवनेश्वर

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सांस्कृतिक और ऐतिहासिक स्थल — २

सांस्कृतिक-ऐतिहासिक स्थल भाग – २   अफसढ़ ( अफसाढ़ ) अफसढ़ बिहार के नवादा जनपद में है। यहाँ से उत्तर गुप्त वंश के ८वें शासक आदित्यसेन का अभिलेख मिला है। इसमें परवर्ती गुप्त के प्रथम शासक कृष्णगुप्त से लेकर आदित्यसेन तक की वंशावली की जानकारी और इसमें उनके मौखरियों से सम्बंध की जानकारी मिलती है।

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वल्लभाचार्य का शुद्धाद्वैतवाद

परिचय शंकर के अद्वैतवाद का भक्ति-मार्ग पर नकारात्मक प्रभाव पड़ा। भक्ति के लिए आराधक ( भक्त ) और आराध्य में द्वैत आवश्यक है जबकि शंकर के अनुसार पारमार्थिक दृष्टि से दोनों एक ही हैं। शंकर व्यावहारिक स्तर पर भक्ति को स्वीकार करते हैं परन्तु ज्ञान-मार्ग के सहायक के रूप में। शंकर का स्पष्ट मत है

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सांस्कृतिक और ऐतिहासिक स्थल — १

सांस्कृतिक और ऐतिहासिक स्थल — १     अमरावती अमरावती वर्तमान आन्ध्र प्रदेश की प्रस्तावित राजधानी है। यह गुन्टूर जिले में कृष्णा नदी के तट पर स्थित है। इसको सातवाहन नरेश शातकर्णि प्रथम ने अपनी राजधानी बनायी थी। बाद में यह इक्ष्वाकुओं की भी राजधानी रही। यहाँ से सातवाहन युगीन बौद्ध स्तूप के अवशेष मिलते

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रामानुजाचार्य का विशिष्टाद्वैतवाद

परिचय शंकराचार्य के अद्वैतवाद का भक्ति-मार्ग पर नकारात्मक प्रभाव पड़ा। भक्ति के लिए आराधक ( भक्त ) और आराध्य में द्वैत आवश्यक है, जबकि शंकर के अनुसार पारमार्थिक दृष्टि से दोनों एक ही हैं। शंकराचार्य व्यावहारिक स्तर पर तो भक्ति को स्वीकार करते हैं, परन्तु ज्ञान-मार्ग के सहायक के रूप में। शंकर का स्पष्ट मत

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शंकराचार्य और उनका दर्शन

शंकराचार्य और उनका दर्शन परिचय भारतीय दर्शन में जिस तत्त्व चिंतन की शुरुआत ऋग्वैदिक काल से हुई थी वह उपनिषदों में अपने पूर्णता को प्राप्त हुई। उपनिषद्, गीता और ब्रह्मसूत्र प्रस्थानत्रयी कहलाते हैं। इनकी व्याख्या हर दार्शनिक अपनी-२ तरह से करता है। किसी को इसमें कर्म-मार्ग सूझती है तो किसी को भक्ति-मार्ग और किसी को

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श्रीमद्भगवद्गीता

श्रीमद्भगवद्गीता परिचय श्रीमद्भगवद्गीता या भगवद्गीता या गीता का भारतीय विचारधारा के इतिहास में लोकप्रियता की दृष्टि से सर्वाधिक महत्वपूर्ण स्थान है। यह हिन्दुओं का सबसे पवित्र और सम्मानित ग्रंथ है। यह महाभारत के छठवें पर्व अर्थात् भीष्मपर्व का भाग है। इसमें महाभारत युद्ध के समय कर्त्तव्यविमुख अर्जुन को भगवान श्रीकृष्ण द्वारा दिये गये उपदेशों का

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वेदान्त दर्शन

वेदान्त दर्शन परिचय वेदान्त का शाब्दिक अर्थ है — वेद का अन्त। वेदों का ज्ञानमार्गी अंश ( उपनिषद ) वेदान्त कहा जाता है। उपनिषद्, गीता और ब्रह्मसूत्र इस दर्शन के आधार ग्रंथ हैं। इसके आधार पर वेदान्त की विभिन्न शाखाओं का विकास हुआ। सामान्यतः इसकी दो शाखायें मानी जाती हैं :— (१) अद्वैतवाद — इसमें

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चार्वाक दर्शन या लोकायत दर्शन

भूमिका चार्वाक दर्शन के संस्थापक वृहस्पति माने जाते हैं। इस दर्शन को लोकायत दर्शन भी कहते हैं। लोकायत का अर्थ है सामान्य लोगों से प्राप्त विचार। इसमें लोक के साथ गहरे लगाव को महत्व दिया गया है और परलोक में अविश्वास व्यक्त किया गया है। इसमें मोक्ष, आत्मा, परमात्मा को महत्वहीन बताया गया है। भारतीय दर्शनों की एक विशेषता है

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