जीवक चिन्तामणि (Jivaka Chintamani)

भूमिका जीवक चिन्तामणि संगमकाल के बहुत बाद की रचना है। इसकी रचना का श्रेय जैन भिक्षु तिरुत्तक्कदेवर को दिया जाता है। उपलब्ध तीन महाकाव्यों में से यह तृतीय महाकाव्य है। संक्षिप्त परिचय नाम — जीवक चिन्तामणि (Jivaka Chintamani) कवि — तिरुत्तक्कदेवर (Tiruttakkadevar) जैन धर्म से सम्बन्धित इसे ‘विग्रह का महाकाव्य’ या ‘विग्रह की पुस्तक’ कहा […]

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मणिमेकलै (मणि-युक्त कंगन) / Manimekalai

भूमिका मणिमेकलै का अर्थ है— मणियुक्त कंगन या मणियों की मेखला। यह शिलप्पादिकारम् की कथा को आगे बढ़ाती है। यह एक “प्रेम-विरोधी कहानी” (Anti-Love-Story) है। यह अपने अपनी पूर्ववर्ती शिल्पादिकारम् की तरह स्वाभाविक नहीं लगती वरन् धर्म की दार्शनिक व्याख्याओं और अन्य धर्मों के खंडन व अपने धर्म के मंडन से बोझिल है। इसके रचनाकार

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शिलप्पदिकारम् (नूपुर की कहानी) / Shilappadikaram (The Ankle Bracelet)

भूमिका सिलप्पदिकारम् / शिलप्पदिकारम् (Silappadikaram / Shilappadikaram) एक अद्वितीय रचना है। दुर्भाग्यवंश इसके लेखक तथा समय के विषय में कुछ निश्चित नहीं है। एक मान्यता के अनुसार इसकी रचना चेरवंश के राजा सेनगुट्टुवन के भाई इलांगो आदिगन ने की थी। परन्तु ए० एल० बाशम इसपर संदेह व्यक्त करते हैं। कहा जाता है कि — अपने

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तृतीय संगम या तृतीय तमिल संगम

भूमिका ८वीं शताब्दी में इरैयनार अगप्पोरुल (Iraiyanar Agappaorul) के भाष्य की भूमिका में हमें तीन संगमों का विवरण मिलता है। इसके अनुसार ये तीनों संगम ९,९९० वर्ष तक चला। इन तीनों संगमों में ८,५९८ कवियों ने भाग लिया। इसे कुल १९७ पाण्ड्य शासकों का संरक्षण प्राप्त हुआ। इन तीन संगमों में से तृतीय संगम (तृतीय

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द्वितीय संगम या द्वितीय तमिल संगम

भूमिका ८वीं शताब्दी में इरैयनार अगप्पोरुल (Iraiyanar Agappaorul) के भाष्य की भूमिका में हमें तीन संगमों का विवरण प्राप्त होता है। इसके अनुसार ये तीनों संगम ९,९९० वर्ष तक चला, जिसमें ८,५९८ कवियों ने भाग लिया और इसे १९७ पाण्ड्य शासकों का संरक्षण प्राप्त हुआ। इन तीन संगमों में से द्वितीय संगम (द्वितीय तमिल संगम)

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प्रथम संगम या प्रथम तमिल संगम

भूमिका आठवीं शताब्दी में इरैयनार अगप्पोरुल (Iraiyanar Agappaorul) के भाष्य की भूमिका में तीन संगमों का विवरण प्राप्त होता है। इसके अनुसार तीनों संगम ९,९९० वर्ष तक चला, जिसमें ८,५९८ कवियों ने भाग लिया और इसे १९७ पाण्ड्य शासकों का संरक्षण प्राप्त हुआ। इन तीन संगमों में से प्रथम संगम (प्रथम तमिल संगम) का संक्षिप्त

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संगमयुग की तिथि या संगम साहित्य का रचनाकाल

भूमिका मौर्योत्तरकाल में सुदूर दक्षिण में कृष्णा और तुंगभद्रा नदी के दक्षिण में जिस सभ्यता और संस्कृति के हमें दिग्दर्शन होते हैं वह जहाँ एक ओर उत्तर भारतीय संस्कृति से भिन्न थे वहीं वे आर्य संस्कृति के तत्त्वों के लिए ग्रहणशील भी बने हुए थे। परन्तु संगमयुग की तिथि और संगम साहित्य के रचनाकाल के

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सुदूर दक्षिण के इतिहास की भौगोलिक पृष्ठभूमि

भूमिका सभ्यता और संस्कृति भूगोल से प्रभावित होती है। लम्बा समुद्र तट, पूर्वी और पश्चिमी घाट, उपजाऊ नदी घाटियाँ और खनिज संसाधनों ने सुदूर संगम इतिहास को सजाया और सँवारा। इस तरह सुदूर दक्षिण के इतिहास के अध्ययन से पूर्व यहाँ की भौगोलिक पृष्ठभूमि पर दृष्टिपात कर लेना समीचीन होगा। भौगोलिक पृष्ठभूमि सुदूर दक्षिण में

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मौर्योत्तर अर्थव्यवस्था (२०० ई०पू० – ३०० ई०) / Post-Mauryan Economy (200 BC – 300 AD)

भूमिका मौर्योत्तर अर्थव्यवस्था भारतीय आर्थिक इतिहास में सम्पन्नता का युग माना जा सकता है। लौह तकनीक के विकास और कृषि के विस्तार की पूर्व की प्रक्रिया इस समय भी अनवरत चलती रही। परिणामस्वरूप कृषि के अधिशेष उत्पादन ने अनेक शिल्पों व उद्योगों को विकसित स्थिति में ला दिया। मौर्योत्तर कालीन साहित्यिक स्रोतों से शिल्पों, शिल्पकारों,

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मौर्योत्तर कला और स्थापत्य

भूमिका मौयर्योत्तर युग कलात्मक विकास की दृष्टि से बहुआयामी था। कला धर्म से प्रभावित थी वह भी मुख्यतया बौद्ध धर्म से और गौणतया हिन्दू व जैन धर्म से। मौर्योत्तर कला की प्रमुख विशेषता है— विभिन्न शैलियों का विकास; यथा— मथुरा कला, गांधार कला, अमरावती कला इत्यादि। आर्थिक समृद्धि ने स्थापत्य कला और मूर्तिकला के विकास

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