मौर्योत्तर साहित्य

भूमिका मौर्योत्तर में प्राकृत, संस्कृत और तमिल भाषाओं में रचनाएँ मिलती हैं। प्राकृत भाषा में अभिलेख लिखवाये जा रहे थे परन्तु संस्कृत भाषा अब धीरे शासनादेश की भाषा बनती जा रही थी। आगे चलकर गुप्तकाल में संस्कृत राजकीय भाषा बनने वाली थी। पूर्व में जहाँ बौद्ध की भाषा पालि थी वहीं महायान शाखा की उत्पत्ति […]

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मौर्योत्तर धार्मिक स्थिति

भूमिका धार्मिक क्षेत्र में मौर्योत्तर विशेषता थी ब्राह्मण या वैदिकधर्म की पुनर्स्थापना तथा महायान बौद्धधर्म का उदय और विकास। इस समय जैनधर्म के स्वरूप में भी कुछ परिवर्तन आया। इसी काल में भक्ति भावना का विकास हुआ जिसके धर्म के साथ-साथ कला, व समाज पर दूरगामी प्रभाव पड़ने वाले थे। मौर्योत्तर धार्मिक स्थिति से सम्बन्धित

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मौर्योत्तर काल में विदेशियों के सामाजिक आत्मसातीकरण में धर्म की भूमिका

भूमिका मौर्योत्तर काल में विदेशियों के सामाजिक आत्मसातीकरण इतिहास की एक प्रमुख घटना थी। विदेशी शासकों का अपना कोई धर्म नहीं था। अतः भारत में बस जाने के उपरान्त उनकी प्रवृत्ति वैष्णव, शैव तथा बौद्ध धर्मों में हुई जो उस समय समाज में प्रतिष्ठित हो चुके थे। भक्ति भावना का उदय हो चुका था तथा

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भारत के प्राचीन बंदरगाह (Ancient ports)

भूमिका बढ़ते समुद्री व्यापार भारतीय उपमहाद्वीप के तटों पर विकसित पत्तनों के कारण सम्भव हुआ। एक ओर तो ये पत्तन पश्चिम में रोमन साम्राज्य से सम्बद्ध थे तो वहीं पूर्व में ये दक्षिण-पूर्व एशिया से जुड़े हुए थे। इस पत्तनों के सम्बन्ध में पुरातत्त्व और साहित्यों से मिलते हैं। ‘पेरिप्लस ऑफ द इरिथ्रियन सी’ में मौर्योत्तर

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मौर्योत्तर नगरीय विकास (Post-Mauryan Urban Growth)

भूमिका मौर्योत्तर युग नगरों के उत्थान एवं उनकी समृद्धि के लिये भी विख्यात है। नगरों के उत्थान के अनेक कारण थे; लेकिन उनमें सबसे अधिक महत्त्वपूर्ण आर्थिक कारण थे। उद्योग-धंधों के विकास, व्यापार-वाणिज्य की प्रगति, मुद्रा अर्थव्यवस्था की प्रधानता ने पुराने नगरों की समृद्धि एवं नये नगरों के उदय का मार्ग प्रशस्त कर दिया। उत्तरी

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मौर्योत्तर व्यापार और वाणिज्य को बढ़ावा देने वाले कारक

भूमिका मौर्योत्तर व्यापार और वाणिज्य (Trade & commerce) की दृष्टि से प्राचीन भारतीय इतिहास का स्वर्णिम युग माना जाता है। जिसके परिणाम हमें तत्कालीन कला, नगरीकरण, मुद्रा व्यवस्था इत्यादि सभी में परिलक्षित होते हैं। इसके साक्ष्य हमें पुरातात्त्विक साक्ष्यों और तत्कालीन साहित्यों से मिलते हैं। कारण इसके प्रमुख कारक निम्नलिखित थे— शिल्प और उद्योग का

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मौर्योत्तर मुद्रा अर्थव्यवस्था (Post-Mauryan monetary economy)

भूमिका मौर्योत्तर मुद्रा अर्थव्यवस्था भारतीय आर्थिक इतिहास में इस दृष्टि से महत्त्वपूर्ण है कि अपने पूर्वगामी व्यवस्था किस पर विकसित थी और परवर्ती काल के लिये आधार प्रदान करने वाली थी। इस काल में सिक्के (विशेषकर ताँबे व सीसे) सामान्य जन द्वारा विनिमय के अंग बन गये थे। साथ ही आन्तरिक व्यापार जहाँ निरन्तर प्रगति

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मौर्योत्तर सिक्के

भूमिका सिक्का निर्माण की दृष्टि से मौर्योत्तर काल अत्यंत महत्त्वपूर्ण है। पूर्ववर्ती पंचमार्क सिक्कों के आगे की यह विकसित अवस्था है। आगे चलकर यह मुद्रा व्यवस्था मानक बनने वाली थी। इसलिए मौर्योत्तर सिक्के पर संक्षिप्त दृष्टिपात समीचीन होगा। प्रमुख विशेषताएँ इस काल के मुद्रा व्यवस्था की कुछ प्रमुख विशेषताएँ अधोलिखित हैं— पहली बार लिखित सिक्के

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मौर्योत्तर राजव्यवस्था (२०० ई०पू० – ३०० ई०)

भूमिका मौर्योत्तर राजव्यवस्था पूर्वगामी मौर्य राजव्यवस्था और विदेशियों द्वारा लाये गये शासन व्यवस्था का समन्वय मिलता है। विदेशी आक्रमणों का प्रभाव भारतीय राजनीति और शासन के कुछ तत्त्वों पर स्पष्टतः दिखायी देता है। प्रमुख विशेषताएँ साम्राज्यिक व्यवस्था जैसा कि हमें ज्ञात है कि सिकन्दर का आक्रमण स्वयं पश्चिमोत्तर में चन्द्रगुप्त मौर्य के एकछत्र साम्राज्य स्थापित करने

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मौर्योत्तर समाज (२०० ई०पू० – ३०० ई०)

भूमिका मौर्योत्तर समाज में एक साथ कई तत्त्वों का आलोड़न-विलोड़न दिखायी देता है। एक ओर शुंग, कण्व व सातवाहन शासकों के नेतृत्व में ब्राह्मणों की सामाजिक व राजनीतिक प्रतिष्ठा पुनर्स्थापित हुई वहीं दूसरी ओर पश्चिमोत्तर से आये विजेता वर्गों (युनानी, शक, पह्लव व कुषाणों) ने वर्ण व्यवस्था के सामने चुनौती प्रस्तुत कर दी। इस राजनीतिक

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